ग्रामीणों के आंदोलन से झुका जिला प्रशासन एवं जिंदल प्रबंधन
रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में गारे पेलमा सेक्टर–1 कोयला खदान को लेकर प्रस्तावित जनसुनवाई के खिलाफ ग्रामीणों का जोरदार आंदोलन आखिरकार रंग ले आया। ग्रामीणों ने इस जनसुनवाई को फर्जी, जनविरोधी और नियमों के विपरीत बताते हुए व्यापक विरोध दर्ज कराया, जिसके दबाव में जिंदल प्रबंधन को जनसुनवाई के लिए किया गया आवेदन वापस लेना पड़ा।

गारे पेलमा सेक्टर–1 परियोजना के विरोध में क्षेत्र के 14 गांवों के ग्रामीण—जिनमें महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा शामिल थे—पिछले करीब 15 दिनों से अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। ग्रामीणों का आरोप था कि जनसुनवाई पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर, जनता की वास्तविक भागीदारी के बिना तथा दबाव और भय के माहौल में कराई गई थी।शुरुआत में ग्रामीणों ने गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन किया, लेकिन इसी दौरान जिंदल कंपनी द्वारा कोयले का परिवहन ट्रैकों के माध्यम से कराए जाने पर पुलिस प्रशासन की सख्ती सामने आई, जिससे ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ गया। हालात इस कदर बिगड़े कि शांत आंदोलन टकराव और विद्रोह की स्थिति में बदल गया और पुलिस तथा ग्रामीणों के बीच लगातार तनाव बना रहा।
इसके बावजूद ग्रामीण अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प पर डटे रहे। लगातार विरोध, जनदबाव और आंदोलन की तीव्रता को देखते हुए अंततः जिला प्रशासन को ग्रामीणों के साथ वार्ता करनी पड़ी। ग्रामीणों ने साफ शब्दों में दो टूक कहा कि जब तक फर्जी जनसुनवाई को रद्द नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
लगातार दबाव के बाद आखिरकार जन आंदोलन की जीत हुई। जिंदल कंपनी को अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी और गारे पेलमा सेक्टर–1 को लेकर प्रस्तावित जनसुनवाई का आवेदन वापस ले लिया गया।
ग्रामीणों ने इस फैसले को लोकतंत्र की जीत और जनता की एकजुटता की ताकत बताया है। उनका कहना है कि यह आंदोलन एक स्पष्ट संदेश देता है—अगर जनता संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो जाए, तो बड़ी से बड़ी कंपनी को भी जनविरोधी फैसले वापस लेने पर मजबूर होना पड़ता है।
गारे पेलमा सेक्टर–1 का यह आंदोलन न केवल स्थानीय संघर्ष है, बल्कि यह जनसुनवाई प्रक्रिया, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
