अविश्वसनीय गवाही व साक्ष्यों की कमी के चलते 2007 के बलात्कार मामले में सजा रद्द, आरोपी बरी
बिलासपुर, 13 जनवरी 2026।छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 2007 के एक बलात्कार प्रकरण में दी गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की गवाही, चिकित्सा साक्ष्यों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है।यह निर्णय न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने आपराधिक अपील क्रमांक 396/2007 में 13 जनवरी 2026 को सुनाया।
अपील अंबिकापुर स्थित विशेष सत्र न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दी गई सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा के विरुद्ध दायर की गई थी।प्रकरण 26 फरवरी 2006 का है, जब सरगुजा जिले के एक गांव में महिला के साथ गन्ने के खेत में जबरन दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन के अनुसार घटना के कुछ दिनों बाद, पीड़िता के पति के लौटने पर एफआईआर दर्ज कराई गई थी। निचली अदालत ने आरोपी को अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आपराधिक धमकी के आरोपों से बरी करते हुए केवल बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया था।
अपील की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पीड़िता, उसके परिजनों, स्वतंत्र गवाहों तथा चिकित्सा साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि पीड़िता ने जहां आरोपी को पहले नहीं जानने का दावा किया, वहीं उसके पति, सास और देवर सहित अन्य गवाहों ने स्वीकार किया कि आरोपी उनका पड़ोसी था और परिवार उससे परिचित था। इससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि चिकित्सा जांच में किसी प्रकार की बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई, जिससे जबरन यौन संबंध का आरोप पुष्ट नहीं होता।
इसके अलावा एफआईआर दर्ज करने में देरी और गवाहों के बयानों में विरोधाभासों ने अभियोजन के मामले को कमजोर किया।सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि बलात्कार के मामलों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन वह गवाही पूर्णतः विश्वसनीय और भरोसेमंद होनी चाहिए। वर्तमान मामले में साक्ष्य इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते।फलस्वरूप, 9 मई 2007 की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया गया तथा आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
आरोपी, जो पहले से जमानत पर था, को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437-ए के तहत निजी मुचलका प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।इस फैसले के साथ लगभग दो दशकों से लंबित आपराधिक प्रकरण का पटाक्षेप हो गया है और न्यायालय ने एक बार फिर गंभीर आपराधिक मामलों में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों की अनिवार्यता को रेखांकित किया है।
