बढ़ती महंगाई में 66 रुपये की दिहाड़ी, कैसे चले रसोइयों का घर?सरकारी स्कूलों में मिड डे मील ठप, बच्चे भूखे रहकर पढ़ने को मजबूर
रसोईयों का हड़ताल जारी
दुर्ग ब्लॉक के निकुम स्कूल से……..
दुर्ग/ समय बदला, सरकारें बदलीं, लेकिन बीते 24 वर्षों में सरकारी स्कूलों के रसोइयों की तक़दीर नहीं बदली। आसमान छूती महंगाई के दौर में जहां टमाटर जैसे आवश्यक सब्जियों के दाम 50 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं, वहीं मिड डे मील बनाने वाले रसोइयों को आज भी मात्र 66 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर काम करना पड़ रहा है।सरकारी स्कूलों में रोज करीब 5 घंटे तक कड़ी मेहनत कर, आग–पानी, धूप–बारिश और धुएं के बीच बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन तैयार करने वाले रसोइयों को महीने में लगभग 2 हजार रुपये का ही मानदेय मिल पा रहा है।
इतनी कम राशि में परिवार का पालन-पोषण कैसे हो, यह एक बड़ा सवाल बन गया है।महंगाई से जूझते रसोइयों ने बताया कि वे कई बार सरकार से वेतन बढ़ाने की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला। अब थक-हार कर रसोइया संघ के हजारों सदस्य अपनी तीन सूत्रीय मांगों को लेकर राजधानी रायपुर में आंदोलनरत हैं। आंदोलन को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई है।
इस आंदोलन का सीधा असर सरकारी स्कूलों पर पड़ रहा है। दुर्ग जिले और आसपास के ब्लॉकों के कई स्कूलों में किचन शेड पर ताले लटके हैं, चूल्हे ठंडे पड़े हैं और मिड डे मील पूरी तरह से बंद है। इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें भूखे पेट पढ़ाई करनी पड़ रही है।रसोइया संघ की प्रतिनिधि राजिम बाई ने बताया, “महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन हमारा वेतन जस का तस है। महीने में मात्र 2 हजार रुपये में न तो ढंग से राशन खरीद सकते हैं और न ही परिवार का खर्च चला सकते हैं।
यही दर्द हर रसोइया कर्मचारी का है, जो स्कूलों में बच्चों के लिए मिड डे मील बनाता है।”ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी चिंताजनक हैं। न शिक्षा की पूरी गारंटी रह गई है और न ही भोजन की। खाली पेट बच्चों से पढ़ाई की उम्मीद करना व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता है।
अब देखना यह है कि सरकार रसोइयों की पीड़ा को कब तक अनसुना करती है और बच्चों के भविष्य पर मंडरा रहे इस संकट का समाधान कब निकलता है।
