मैत्रेयी महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परम्परा पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का गरिमामय समापन

मैत्रेयी महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परम्परा पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का गरिमामय समापन

नई दिल्ली, 17 अप्रैल 2026।दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध मैत्रेयी महाविद्यालय के विदुषी अरुन्धती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र द्वारा “भारतीय ज्ञान परम्परा : अंतरविषयी परिप्रेक्ष्य” विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफल समापन हो गया। यह सम्मेलन स्कूल ऑफ इंडिक स्टडीज़, और काउंसिल ऑफ इंडिक स्टडीज़ एंड रिसर्च के सहयोग से महाविद्यालय के एन.एस.बी. सेमिनार हॉल में आयोजित हुआ। इस अवसर पर देश-विदेश के विद्वानों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही।

कार्यक्रम का शुभारम्भ गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इसके पश्चात डॉ. कुमुद रानी गर्ग ने गणेश वन्दना प्रस्तुत किया। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. हरित्मा चोपड़ा तथा उप-प्राचार्या प्रो. ज्योति सिंह ने सभी सम्मानित अतिथियों का महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा निर्मित अंगवस्त्र तथा पौधा देकर स्वागत एवं सम्मान किया गया। अपने उद्बोधन में वक्तव्य में मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. हरित्मा चोपड़ा ने भारतीय ज्ञान परम्परा की शाश्वत प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए परम्परागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि वैश्विक समुन्नति के लिए यह समन्वय नितान्त आवश्यक है तथा शिक्षा इस प्रक्रिया का प्रमुख सेतु है, जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और व्यावहारिक समझ को विकसित कर अतीत की जड़ों को वर्तमान की आवश्यकताओं से जोड़ती है।इसके पश्चात्‌ मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि वास्तविक शिक्षा तभी प्रभावी होती है, जब वह सांस्कृतिक पहचान में निहित होकर जीवन में परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है।

उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल शैक्षणिक जानकारी नहीं, अपितु विवेक और नागरिक उत्तरदायित्व विकसित करने का एक सशक्त माध्यम बताया। छात्र कल्याण को केंद्र में रखते हुए उन्होंने ऐसे आधुनिक पाठ्यक्रम की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें नैतिक उन्नति और बौद्धिक विकास का संतुलित समन्वय हो। उन्होंने मैत्रेयी, अरुन्धती जैसी विदुषियों द्वारा शिक्षा में किए गए योगदान और महत्त्व को भी रेखांकित किया।

कार्यक्रम में बतौर सम्मानित अतिथि उपस्थित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव डॉ. ओम जी उपाध्याय ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का भविष्य गहन शोध, प्रामाणिक स्रोतों के पुनर्पाठ और उनके पुनर्व्याख्यान में निहित है। उन्होंने कहा कि भारतीय परम्परा में वैज्ञानिक और दार्शनिक विचारों की समृद्ध परंपरा है, जिसे आज के समय के अनुसार नए ढंग से समझना आवश्यक है, जिससे यह अधिक प्रासंगिक और उपयोगी बन सके। संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्यमान सक्षम के राष्ट्रीय संगठन मन्त्री श्री चन्द्र शेखर ने भारतीय ज्ञान परम्परा को व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य संतुलित सामंजस्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह परम्परा नैतिक जीवन एवं सामूहिक कल्याण का व्यावहारिक मार्गदर्शक है।

उन्होंने आधुनिक प्रगति और सांस्कृतिक मूल्यों के मध्य संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए इन सिद्धांतों को दैनिक जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।इस अवसर पर विदुषी अरुंधती भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र द्वारा अपने वार्षिक शैक्षणिक समारोह ज्ञानोत्सव के सफल समापन की भी घोषणा की गई तथा इसके विजेताओं को स्मृति-चिह्न एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। साथ ही नकद पुरस्कारों की घोषणा भी की गयी। इस दौराने केन्द्र के नोडल अधिकारी एवं समन्वयक डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने सम्मेलन की उपलब्धियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। साथ ही सम्मेलन में भाग लेने वाले शोधपत्र वाचकों को भी प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।

कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. प्रज्ज्वलित शिखा एवं डॉ. धर्मेन्द्र कुमार द्वारा किया गया। अन्त में उप-प्राचार्या एवं केन्द्र की उपनिदेशिका प्रो. ज्योति सिंह ने सभी अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, आयोजन समिति तथा विदुषी अरुन्धती भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र के इंटर्न्स के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। गौरतलब है कि इन्स्टीट्यूट ऑफ एड्वांस्ड साइंसेज के निदेशक प्रो. बलराम सिंह के मार्गदर्शन में इस त्रिदिवसीय ज्ञानयज्ञ रूपी में संगोष्ठी में कुल 21 सत्र आयोजित हुए जिसमें 45 अति विशिष्ट अतिथियों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ तथा 200 से अधिक शोधपत्रों का वाचन हुआ।

राष्ट्रगान के साथ इस त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल एवं गरिमामय समापन हुआ।

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