कचरे से कमाई का कमाल: कोलिहापुरी की महिलाओं ने 2730 किलो प्लास्टिक बेचकर कमाए ₹46 हजार
स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का अनूठा संगम, दुर्ग का मॉडल बना मिसाल
दुर्ग। अक्सर लोग प्लास्टिक कचरे को बेकार समझकर फेंक देते हैं, लेकिन दुर्ग जिले की ग्राम पंचायत कोलिहापुरी की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि सही सोच और बेहतर प्रबंधन से यही कचरा आय का सशक्त साधन बन सकता है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत शुरू हुई यह पहल आज महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका का सफल मॉडल बन गई है।
कलेक्टर श्री अभिजीत सिंह और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री बजरंग कुमार दुबे के मार्गदर्शन में कोलिहापुरी ग्राम पंचायत ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में एक ऐसी मिसाल कायम की है, जिसकी चर्चा अब पूरे जिले में हो रही है। गांव की महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्याओं ने घर-घर से एकत्रित किए गए 2730 किलो प्लास्टिक कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में छांटकर अधिकृत रिसायकल इकाइयों को बेचा, जिससे उन्हें कुल ₹46,410 की आय प्राप्त हुई।
यह उपलब्धि केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण समाज में जागरूकता और बदलाव की नई कहानी भी लिख रही है। जिन प्लास्टिक कचरों को पहले लोग समस्या मानते थे, आज वही महिलाओं के लिए आय का स्रोत बन गए हैं। इससे गांव में स्वच्छता बढ़ी है, पर्यावरण सुरक्षित हो रहा है और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है।कोलिहापुरी में अपनाई गई व्यवस्था त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
गांव की महिलाएं प्रतिदिन घर-घर जाकर गीला, सूखा और प्लास्टिक कचरा अलग-अलग एकत्र करती हैं। साथ ही ग्रामीणों को भी स्रोत पर ही कचरे का पृथक्करण करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसके बाद संग्रहित प्लास्टिक को विकासखंड स्तर पर स्थित एमआरएफ-पीडब्ल्यूएमयू सेंटर में भेजा जाता है, जहां उसे गुणवत्ता के अनुसार PET, HDPE और LDPE जैसी श्रेणियों में अलग किया जाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से प्लास्टिक का मूल्य बढ़ जाता है और बेहतर कीमत प्राप्त होती है।
इस पहल का सबसे बड़ा संदेश यह है कि स्वच्छता केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी से जुड़ा जनआंदोलन है। यदि प्रत्येक परिवार घर पर ही कचरे का पृथक्करण करना शुरू कर दे तो न केवल गांव और शहर स्वच्छ होंगे, बल्कि कचरे से रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा होंगे।कोलिहापुरी की सफलता से प्रेरित होकर अब धमधा विकासखंड की ग्राम पंचायत लिटिया तथा पाटन विकासखंड की ग्राम पंचायत पतोरा और गाड़ाडीह में भी इसी मॉडल को अपनाया जा रहा है।
जिला प्रशासन का लक्ष्य इस व्यवस्था को जिले की सभी ग्राम पंचायतों तक पहुंचाना है, ताकि स्वच्छता के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सके।मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत दुर्ग श्री बजरंग कुमार दुबे ने कहा कि कोलिहापुरी की महिलाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वच्छता और आजीविका एक-दूसरे के पूरक हैं। सही मार्गदर्शन, सामुदायिक सहभागिता और सकारात्मक सोच से कचरे को भी आर्थिक संसाधन में बदला जा सकता है।कोलिहापुरी की यह कहानी पूरे समाज को यह संदेश देती है कि यदि हम कचरे को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखना शुरू कर दें तो स्वच्छ पर्यावरण, आत्मनिर्भर महिलाएं और समृद्ध गांव—तीनों लक्ष्य एक साथ हासिल किए जा सकते हैं।
यह केवल एक गांव की सफलता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बढ़ता एक मजबूत कदम है।
